शिकारी या संरक्षणवादी?

उन्होंने 30 से अधिक नरभक्षियों को मारा, फिर बने संरक्षण के प्रतीक। उनका एक उपनाम था – 'कार्पेट साहब'। क्यों? आगे जानिए…

रात को खड़ी चट्टान पर तीन रौशनियाँ दिखीं, फिर दो और, सब आपस में मिल गईं। कॉर्बेट ने खुद देखा, पर स्पष्टीकरण नहीं दिया। आगे जानिए चुड़ैल की चीख का वाकया…

13 साल में सुलझाई अनसुलझी हत्या

जिस कब्रिस्तान में उनके पिता दफन थे, वहाँ एक ताजा कब्र में लाश नहीं थी। कॉर्बेट ने जासूसी की और असली कारण पता लगाया। क्या था राज़? आगे पढ़िए…

साँप मारने का अंधविश्वास – शिकार से पहले का रिवाज़

विज्ञानवादी होते हुए भी अत्यधिक अंधविश्वासी। हर नरभक्षी के शिकार से एक दिन पहले एक साँप मारते थे। क्यों करते थे ऐसा? आगे जानिए…

मौत के बाद भी नहीं रुका खौफ – कॉर्बेट की आत्मा

केन्या में मृत्यु के बाद उनकी आत्मा उत्तराखंड के जंगलों में विचरण करती है। पार्क कर्मचारी अक्सर रात में नीली रोशनी देखते हैं। आगे पढ़िए…

कॉर्बेट पार्क – बाघों के साथ भूतों का डेरा

एक स्त्री जो पुरुषों की आवाज़ में बोलती है, लोग जो बाल्टियों भर पानी पीते हैं। कर्मचारी और ग्रामीण आज भी कहानियाँ सुनाते हैं। अंतिम स्लाइड में जानिए 126 लाशों का हिसाब…

126 लाशों का हिसाब – रुद्रप्रयाग का नरभक्षी तेंदुआ

8 वर्षों में 126 लोग मारे। मई 1926 में कॉर्बेट ने उसी पेड़ के नीचे से तेंदुए को मारा, जहाँ आज स्मारक है। आगे जानिए आखिरी रहस्य…

केन्या में मौत या फरार? आखिरी रहस्य

1955 में हार्ट अटैक से मृत्यु, पर दशकों तक अफवाह फैली कि वे भारत वापस आ गए थे। उनकी राख कहाँ है? क्या 'कार्पेट साहब' आज भी ज़िंदा हैं? फैसला आपका…